सूरजपुर : छत्तीसगढ़ सरकार में गरीब आदिवासियों के राशन पर बड़ा सवाल! मंडल अध्यक्ष का नाम चर्चा में, 348 क्विंटल चावल की कमी का मामला! कलेक्टर तक पहुंची शिकायत, पखवाड़ा बीता… कार्रवाई अब भी शून्य?
क्या रसूख के आगे प्रशासन बेबस है, या गरीबों के हक का हिसाब दबा दिया गया?
जब सत्ताधारी दल के पदाधिकारी पर आरोप हों, तो आम नागरिक न्याय के लिए किस दरवाजे पर जाएं?
चंद्रिका कुशवाहा,सूरजपुर
सूरजपुर जिले के प्रतापपुर क्षेत्र अंतर्गत ग्राम पंचायत नरोला की शासकीय उचित मूल्य दुकान में सामने आई 348 क्विंटल चावल की कमी का मामला अब प्रशासनिक कार्रवाई पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। राशन दुकान की कथित अनियमितताओं को लेकर लगातार खबरें प्रकाशित हुईं, सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हुए और कलेक्टर सूरजपुर को लिखित शिकायत भी सौंपी गई। इसके बावजूद जांच में कमी सामने आने के बाद भी जिम्मेदारों पर अंतिम कार्रवाई नहीं होने से ग्रामीणों और जागरूक नागरिकों में आक्रोश बढ़ता जा रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यही है—जब जांच में सैकड़ों क्विंटल चावल की कमी सामने आ चुकी है, तो आखिर कार्रवाई अब तक क्यों नहीं हुई?
जांच में 348 क्विंटल चावल की कमी, फिर भी कार्रवाई लंबित,
प्राप्त शिकायतों और प्रशासनिक जांच से संबंधित जानकारी के अनुसार, नरोला उचित मूल्य दुकान में 348 क्विंटल चावल की कमी के साथ चना एवं शक्कर के वितरण में भी अनियमितता सामने आने की बात कही गई है। मामले में संबंधित समिति को नोटिस जारी किए जाने तथा जांच प्रक्रिया आगे बढ़ने की जानकारी सामने आई है।
शिकायतकर्ताओं का कहना है कि जांच के दौरान खाद्यान्न की कमी सामने आने के बाद भी प्राथमिकी दर्ज नहीं हुई है और न ही शासन को हुई क्षति की वसूली तथा जिम्मेदारों की जवाबदेही को लेकर कोई स्पष्ट सार्वजनिक कार्रवाई सामने आई है। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जांच में कमी पाए जाने के बाद कार्रवाई की फाइल किस स्तर पर अटकी हुई है।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि जांच में कमी सामने आना और किसी व्यक्ति का कानूनी रूप से दोष सिद्ध होना अलग-अलग विषय हैं। अंतिम जिम्मेदारी दस्तावेजों, स्टॉक सत्यापन और नियमानुसार जांच के आधार पर तय होनी चाहिए। लेकिन यदि विभागीय जांच में गबन या अनियमितता प्रमाणित हुई है, तो कार्रवाई में देरी का कारण सार्वजनिक किया जाना आवश्यक है।
खबर प्रकाशन के बाद कुछ राशन बांटा, सैकड़ों क्विंटल का हिसाब कौन देगा?
ग्रामीणों के अनुसार, मामला समाचार पत्रों में प्रकाशित होने के बाद कुछ हितग्राहियों को चावल का वितरण किया गया। हालांकि, शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि कुछ क्विंटल चावल बांट देने से सैकड़ों क्विंटल की कथित कमी का सवाल खत्म नहीं हो जाता।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि पहले हितग्राहियों के नाम पर राशन वितरण दर्ज किया गया था और बाद में खबर प्रकाशन के बाद राशन बांटा गया, तो पूरे रिकॉर्ड की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। किस हितग्राही को कितना राशन मिला, कितना स्टॉक उपलब्ध था और कितनी मात्रा में कमी पाई गई—इन सभी सवालों का स्पष्ट जवाब जरूरी है।
खाद्य निरीक्षक बोले—कानूनी कार्रवाई जारी,
मामले में खाद्य निरीक्षक शशि जायसवाल ने बताया कि कानूनी कार्रवाई जारी है। उनके अनुसार, समिति दुकानदार को दो नोटिस जारी किए गए थे और दूसरे नोटिस का जवाब संबंधित पक्ष द्वारा दिया गया है। उन्होंने यह भी बताया कि कुछ हितग्राहियों से पूर्व में अंगूठा लगवाया गया था, जिन्हें अब राशन वितरण कर दिया गया है।
खाद्य निरीक्षक के अनुसार, लगभग 300 क्विंटल चावल के गमन को लेकर कार्रवाई चल रही है तथा मामले की जानकारी जिला स्तर पर अग्रिम कार्रवाई के लिए भेजी गई है।
विभागीय अधिकारी के इस बयान के बावजूद सवाल बना हुआ है कि जब मामला जिला स्तर पर भेज दिया गया है, तो अब तक प्राथमिकी, वसूली और जिम्मेदारों पर अंतिम कार्रवाई की स्थिति क्या है? क्या सिर्फ नोटिस और जवाब लेने की प्रक्रिया से गरीबों के राशन का हिसाब पूरा हो जाएगा?
कलेक्टर ने दिए कार्रवाई के निर्देश, अब अमल का इंतजार,
मामले को लेकर कलेक्टर सूरजपुर श्रीमती रैना जमील ने कहा कि फाइल मंगाकर संबंधित विभाग को कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। उन्होंने चावल के गमन के मामले में कड़ी कार्रवाई की बात कही है।
कलेक्टर के निर्देश के बाद ग्रामीणों को उम्मीद है कि अब मामले में ठोस कार्रवाई होगी। लेकिन शिकायतकर्ताओं का कहना है कि जांच में कमी सामने आने और प्रशासन के संज्ञान में मामला पहुंचने के बावजूद कार्रवाई में देरी से जिम्मेदारों के हौसले बढ़ रहे हैं।
राजनीतिक नामों की चर्चा, निष्पक्ष जांच की मांग,
मामले में गोविंदपुर भाजपा मंडल अध्यक्ष संजय मरावी सहित अन्य लोगों के नाम शिकायतों और ग्रामीणों के आरोपों के माध्यम से चर्चा में आने की बात कही गई है। हालांकि, किसी भी व्यक्ति की संलिप्तता का अंतिम निर्धारण जांच और साक्ष्यों के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
ग्रामीणों का आरोप है कि गरीब हितग्राहियों के हिस्से का राशन यदि किसी स्तर पर गबन हुआ है, तो राजनीतिक या प्रभावशाली लोगों के नाम सामने आने के बावजूद निष्पक्ष कार्रवाई होनी चाहिए। शिकायतकर्ताओं ने मांग की है कि मामले की स्वतंत्र जांच कराकर दोषियों पर नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
पीओएस मशीन से लेकर घर-घर सत्यापन तक हो जांच,
राशन दुकान के मामले में केवल स्टॉक की कमी दर्ज करना पर्याप्त नहीं होगा। पिछले 12 से 24 माह के आवंटन, उठाव, परिवहन, स्टॉक और वितरण का माहवार मिलान कराया जाना चाहिए।
इसके साथ ही पीओएस मशीन के रिकॉर्ड, बायोमेट्रिक सत्यापन, वितरण पंजी और ऑनलाइन अभिलेखों की जांच जरूरी है। जिन हितग्राहियों के नाम पर राशन वितरण दर्ज है, उनसे घर-घर सत्यापन कर वास्तविक स्थिति सामने लाई जानी चाहिए।
यदि जांच में फर्जी वितरण, राशन की हेराफेरी या गबन की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदारों पर नियमानुसार कार्रवाई और शासन को हुई क्षति की वसूली की जानी चाहिए।
पखवाड़े बाद भी कार्रवाई नहीं, ग्रामीणों का सवाल—कब मिलेगा गरीबों के हक का हिसाब?
नरोला राशन दुकान का मामला अब केवल एक उचित मूल्य दुकान की अनियमितता तक सीमित नहीं रह गया है। यह सार्वजनिक वितरण प्रणाली की पारदर्शिता और गरीब हितग्राहियों के अधिकारों से जुड़ा गंभीर सवाल बन चुका है।
शिकायतकर्ताओं के अनुसार, 7 सितंबर 2026 को कलेक्टर सूरजपुर के नाम आवेदन देकर स्वतंत्र जांच, प्राथमिकी, वसूली, हितग्राही सत्यापन और आवेदकों को जांच प्रक्रिया में शामिल करने की मांग की गई थी। इसके बावजूद कार्रवाई की स्पष्ट जानकारी अब तक सामने नहीं आई है।
ग्रामीणों का सवाल है कि जब जांच में 348 क्विंटल चावल की कमी सामने आने की बात कही जा रही है, तो कार्रवाई में इतना विलंब क्यों? क्या गरीबों के हिस्से के राशन का हिसाब सिर्फ कागजों में चलता रहेगा या जिम्मेदारों पर वास्तविक कार्रवाई भी होगी?
अब निगाहें प्रशासन पर हैं—जांच में सामने आई कमी पर कार्रवाई कब होगी और गरीब हितग्राहियों को उनके हक का पूरा हिसाब कब मिलेगा?