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सूरजपुर : नरोला राशन घोटाला: जांच में 348 क्विंटल खाद्यान्न का गबन प्रमाणित, भाजपा मंडल अध्यक्ष का नाम आने से सियासी भूचाल.. ट्रिपल इंजन की सरकार में गरीबों के राशन की ऐसी हालत क्यों? खबर के बाद समिति निलंबित, प्रथम नोटिस जारी; जांच में दोष सिद्ध होने के बाद अब कार्रवाई की बारी…

नरोला राशन कांड में जांच ने खोल दिया 348 क्विंटल का राज! गरीबों के हिस्से का खाद्यान्न गायब… नाम सामने आते ही प्रतापपुर की सियासत में भूचाल! भाजपा मंडल अध्यक्ष से जुड़ा मामला, समिति निलंबित और प्रथम नोटिस जारी—अब अगला नंबर किसका? ट्रिपल इंजन की सरकार में 348 क्विंटल का हिसाब कौन देगा? कार्रवाई से पहले उठे कई बड़े सवाल!

चंद्रिका कुशवाहा,सूरजपुर

विकासखंड प्रतापपुर अंतर्गत ग्राम पंचायत नरोला की शासकीय उचित मूल्य दुकान में सामने आया राशन घोटाला अब बेहद गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। मामले की विभागीय जांच पूरी हो चुकी है और जांच में 348 क्विंटल चावल की कमी/गबन प्रमाणित पाया गया है। जांच के निष्कर्ष सामने आने के बाद संबंधित संचालन समिति के खिलाफ निलंबन की कार्रवाई की गई है तथा प्रथम नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया है।

मामले की गंभीरता इसलिए और बढ़ गई है क्योंकि राशन दुकान के संचालन से जुड़े प्रकरण में भाजपा मंडल अध्यक्ष गोविंदपुर गोविन्द का नाम भी सामने आया है। किसी व्यक्ति की अंतिम व्यक्तिगत जिम्मेदारी और आपराधिक भूमिका का निर्धारण संबंधित दस्तावेजों तथा नियमानुसार आगे होने वाली कार्रवाई से होगा, लेकिन जांच में खाद्यान्न की भारी कमी प्रमाणित होना अपने आप में सरकारी राशन व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

348 क्विंटल चावल की कमी ने खोली व्यवस्था की परतें,

शासकीय उचित मूल्य दुकान गरीब परिवारों के लिए सरकार की सबसे महत्वपूर्ण जनकल्याणकारी व्यवस्थाओं में से एक है। यहां पहुंचने वाला चावल, चना और शक्कर किसी समिति या व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं, बल्कि पात्र हितग्राहियों का अधिकार है।

नरोला की राशन दुकान में शिकायतों के बाद खाद्य विभाग द्वारा स्टॉक, वितरण रजिस्टर और संबंधित अभिलेखों की जांच की गई। जांच पूरी होने के बाद 348 क्विंटल चावल की कमी/गबन प्रमाणित पाया गया। यह आंकड़ा मामूली कमी नहीं है, बल्कि इतनी बड़ी मात्रा है कि इससे पूरी राशन वितरण व्यवस्था की निगरानी और जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

ग्रामीणों की ओर से जुलाई और अगस्त माह के राशन वितरण में अनियमितता की शिकायतें भी सामने आई थीं। अब जांच में भारी खाद्यान्न कमी प्रमाणित होने के बाद उन शिकायतों की गंभीरता और बढ़ गई है।

खबर प्रकाशन के बाद प्रशासन हरकत में,

मामले को लेकर खबर प्रकाशित होने के बाद प्रशासन और खाद्य विभाग की कार्रवाई तेज हुई। संबंधित समिति को निलंबित किया गया तथा प्रथम नोटिस जारी कर जवाब मांगा गया है।

राशन दुकान को वैकल्पिक व्यवस्था के तहत दूसरी शासकीय उचित मूल्य दुकान से संबद्ध किया गया है, ताकि गरीब हितग्राहियों को राशन वितरण प्रभावित न हो।

फूड इंस्पेक्टर शशि जायसवाल द्वारा दुकान का निरीक्षण कर स्टॉक और दस्तावेजों की जांच की गई थी। विभागीय जांच के बाद अब यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि 348 क्विंटल खाद्यान्न की कमी जांच में प्रमाणित हुई है।

यानी मामला अब केवल शिकायत या आरोप तक सीमित नहीं है। जांच की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है और उसके निष्कर्ष के आधार पर विभागीय कार्रवाई आगे बढ़ रही है।

भाजपा मंडल अध्यक्ष का नाम आने से सियासी भूचाल,

नरोला राशन प्रकरण में भाजपा मंडल अध्यक्ष का नाम सामने आने के बाद मामला केवल प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा। राजनीतिक गलियारों में भी इसको लेकर सवाल उठने लगे हैं।

जिस राजनीतिक दल की सरकार में गरीबों को खाद्यान्न उपलब्ध कराने के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली संचालित हो रही है, उसी व्यवस्था से जुड़े मामले में भाजपा के मंडल स्तर के पदाधिकारी का नाम चर्चा में आना निश्चित रूप से गंभीर राजनीतिक सवाल खड़ा करता है।

हालांकि किसी पद पर होना अपने आप में किसी व्यक्ति को दोषी नहीं बनाता। इसलिए व्यक्तिगत जिम्मेदारी का निर्धारण भी नियमानुसार साक्ष्यों के आधार पर ही होना चाहिए। लेकिन यदि जांच और आगे की कार्रवाई में किसी व्यक्ति की भूमिका सामने आती है तो राजनीतिक पहचान या पद उसके लिए बचाव का आधार नहीं बनना चाहिए।

गरीब के राशन में गड़बड़ी है तो कार्रवाई भी निष्पक्ष होनी चाहिए—चाहे जिम्मेदारी किसी की भी निकले,

ट्रिपल इंजन की सरकार में गरीबों का राशन कौन देख रहा है?

देश और प्रदेश में विकास तथा सुशासन को लेकर ट्रिपल इंजन की सरकार का दावा किया जाता है। ऐसे में नरोला जैसे मामले कई गंभीर सवाल खड़े करते हैं।

यदि गरीबों के लिए आवंटित खाद्यान्न में जांच के दौरान 348 क्विंटल की कमी प्रमाणित हो जाती है तो सवाल यह है कि इतने बड़े अंतर का पता समय रहते क्यों नहीं चला?

क्या नियमित स्टॉक सत्यापन केवल कागजों तक सीमित रहा? क्या वितरण व्यवस्था की निगरानी ठीक से हुई? क्या हितग्राहियों को वास्तव में उतना राशन मिला, जितना सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज किया गया? क्या जिम्मेदार अधिकारियों और संचालन समिति की निगरानी व्यवस्था प्रभावी थी?

ये सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि राशन में होने वाली गड़बड़ी का सीधा असर गरीब परिवारों की थाली पर पड़ता है।

ट्रिपल इंजन की सरकार में सड़क, भवन और विकास कार्यों के साथ गरीब की थाली की निगरानी भी उतनी ही जरूरी है।

गरीब का राशन किसी की जागीर नहीं

सरकारी राशन व्यवस्था का उद्देश्य उन परिवारों तक खाद्यान्न पहुंचाना है, जिनके लिए बाजार से महंगा राशन खरीदना कठिन है। ऐसे में यदि 348 क्विंटल चावल की कमी जांच में प्रमाणित हुई है तो यह मामला गंभीर प्रशासनिक जवाबदेही की मांग करता है।

ग्रामीणों की ओर से पात्र हितग्राहियों को राशन नहीं मिलने और वितरण रिकॉर्ड में कथित अनियमितताओं की शिकायतें भी सामने आई थीं। यदि रिकॉर्ड और वास्तविक वितरण में अंतर पाया जाता है तो इसकी पूरी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

गरीब के हिस्से का एक-एक दाना सरकार की जिम्मेदारी है। उस दाने का हिसाब भी उतनी ही सख्ती से होना चाहिए।

कलेक्टर ने दिए अपराध दर्ज कराने के संकेत

सूरजपुर कलेक्टर रैना जमील ने मामले को गंभीरता से लेते हुए स्पष्ट किया है कि जांच में गबन अथवा अन्य अनियमितता प्रमाणित पाए जाने पर संबंधित लोगों के खिलाफ नियमानुसार अपराध दर्ज कराने की कार्रवाई की जाएगी।

मामले में प्रथम नोटिस जारी किया जा चुका है। अब संबंधित पक्ष से जवाब लिया जाएगा और नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी।

यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि जांच में 348 क्विंटल खाद्यान्न की कमी प्रमाणित हो चुकी है। इसलिए अब सवाल जांच के होने या न होने का नहीं, बल्कि जांच में सामने आए निष्कर्ष के आधार पर आगे की कार्रवाई का है।

अब 348 क्विंटल का हिसाब और जिम्मेदारी तय होने का इंतजार,

नरोला राशन घोटाले में सबसे बड़ा सवाल अब भी यही है—348 क्विंटल चावल आखिर गया कहां?

किस स्तर पर कमी हुई? स्टॉक किसके जिम्मे था? वितरण रिकॉर्ड में क्या दर्ज है? वास्तविक हितग्राहियों तक कितना खाद्यान्न पहुंचा? चावल के साथ चना और शक्कर के वितरण में क्या स्थिति रही? और सबसे महत्वपूर्ण—इस पूरे मामले में जिम्मेदारी किन-किन लोगों की तय होती है?

इन सवालों का जवाब अब विभागीय कार्रवाई और उसके बाद सामने आने वाले निर्णय से मिलेगा।

फिलहाल समिति निलंबित है, प्रथम नोटिस जारी हो चुका है और जांच में खाद्यान्न की भारी कमी प्रमाणित हो चुकी है। ऐसे में ग्रामीणों की निगाह अब अगली कार्रवाई पर टिकी हुई है।

सवाल सिर्फ राशन का नहीं, व्यवस्था की विश्वसनीयता का है,

नरोला का मामला अब केवल एक उचित मूल्य दुकान का विवाद नहीं रह गया है। यह सरकारी राशन व्यवस्था की निगरानी, प्रशासनिक जवाबदेही और राजनीतिक प्रभाव के बीच निष्पक्ष कार्रवाई की परीक्षा बन गया है।

यदि जांच में 348 क्विंटल खाद्यान्न की कमी प्रमाणित हुई है तो अब कार्रवाई भी उसी गंभीरता से होनी चाहिए। गरीबों के हिस्से के खाद्यान्न से जुड़े मामले में किसी भी तरह की नरमी जनता के विश्वास को प्रभावित कर सकती है।

ट्रिपल इंजन की सरकार में सवाल यही है—जब गरीब के हिस्से का 348 क्विंटल राशन कम हो गया, तो निगरानी तंत्र कहां था?

अब नरोला की जनता सिर्फ नोटिस नहीं देखना चाहती। जनता यह देखना चाहती है कि जांच में प्रमाणित गड़बड़ी के बाद दोषी कौन ठहराया जाता है, कितनी कार्रवाई होती है और गरीबों के हिस्से के राशन का हिसाब आखिर कौन देता है।

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