सूरजपुर : चार साल पुरानी फाइल ने फिर बढ़ाई प्रशासन की बेचैनी! चार साल से दबा था राज, अब कलेक्टर की चौखट पर पहुंची फाइल! 12 जनवरी 2022 की चेतावनी के बाद भी आखिर क्यों नहीं रुका हादसा? 15 दिन का अल्टीमेटम… कार्रवाई नहीं तो हाईकोर्ट तक जाएगा मामला!
चार साल पुरानी फाइल ने फिर बढ़ाई प्रशासन की बेचैनी! चार साल से दबा था राज, अब कलेक्टर की चौखट पर पहुंची फाइल! 12 जनवरी 2022 की चेतावनी के बाद भी आखिर क्यों नहीं रुका हादसा? 15 दिन का अल्टीमेटम… कार्रवाई नहीं तो हाईकोर्ट तक जाएगा मामला!
जांच अब तक लंबित है तो चार साल क्यों? कार्रवाई नहीं हुई तो हाईकोर्ट जाने की तैयारी, वन एवं विद्युत विभाग की जवाबदेही पर उठे गंभीर सवाल,
बलरामपुर/सूरजपुर,
दरहोरा क्षेत्र में वर्ष 2022 में हाईटेंशन विद्युत तार की चपेट में आने से हुई गर्भवती हथिनी की मौत का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। घटना के करीब चार वर्ष बाद भी जांच और कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट नहीं होने का सवाल उठाते हुए चंद्रिका कुशवाहा ने 10 सितंबर 2026 को जिला कलेक्टर सूरजपुर के समक्ष अंतिम अनुस्मारक एवं कानूनी अभ्यावेदन प्रस्तुत किया है। आवेदन में पूरे मामले की निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच, जिम्मेदारी तय करने और कार्रवाई की वर्तमान स्थिति लिखित रूप से बताने की मांग की गई है।
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल उस दस्तावेज को लेकर खड़ा किया गया है, जो घटना से पहले की स्थिति की ओर इशारा करता है। अभ्यावेदन के अनुसार 12 जनवरी 2022 को तत्कालीन वन परिक्षेत्राधिकारी, प्रतापपुर ने विद्युत विभाग को हाथी विचरण क्षेत्र में लुज विद्युत तार एवं अवैध हुकिंग से संभावित खतरे के संबंध में पत्र भेजा था। ऐसे में अब सवाल यह है कि यदि विद्युत विभाग को संभावित खतरे की पूर्व सूचना दी गई थी, तो उसके बाद क्या कार्रवाई की गई? क्या विद्युत लाइन और तारों का निरीक्षण हुआ? क्या सुरक्षा संबंधी सुधार किए गए? और यदि किए गए तो उनका रिकॉर्ड कहां है?
चार साल बाद भी जांच जारी तो क्यों?
अभ्यावेदन में सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत प्राप्त जानकारी का भी उल्लेख किया गया है। आवेदनकर्ता का कहना है कि उपलब्ध कराई गई जानकारी में यदि जांच प्रक्रिया अब भी जारी या लंबित बताई गई है, तो वर्ष 2022 से वर्ष 2026 तक जांच पूरी नहीं होने का कारण भी स्पष्ट किया जाना चाहिए।
यही सवाल अब प्रशासन के सामने सबसे महत्वपूर्ण चुनौती के रूप में रखा गया है। आवेदन में पूछा गया है कि जांच किस अधिकारी अथवा समिति द्वारा की जा रही है, जांच का आदेश कब जारी हुआ, वर्तमान में जांच किस स्तर पर है और अब तक किन अधिकारियों या कर्मचारियों के संबंध में क्या कार्रवाई की गई है।
एक मौत, लेकिन सवाल कई,
अभ्यावेदन में मामले को केवल वन्यजीव मृत्यु की घटना नहीं माना गया है, बल्कि इसे वन्यजीव संरक्षण, विद्युत सुरक्षा, विभागीय जिम्मेदारी और संभावित कर्तव्य चूक से जुड़ा गंभीर विषय बताया गया है।
आवेदनकर्ता ने मांग की है कि हथिनी की मौत से जुड़े सभी महत्वपूर्ण अभिलेखों की जांच की जाए। इनमें पंचनामा, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, घटनास्थल निरीक्षण रिपोर्ट, वन विभाग की जांच रिपोर्ट, विद्युत विभाग की जांच रिपोर्ट और दोनों विभागों के बीच हुआ पत्राचार प्रमुख हैं।
साथ ही 12 जनवरी 2022 के वन विभागीय पत्र पर विद्युत विभाग ने क्या कार्रवाई की थी, इसकी भी जांच करने और संबंधित अभिलेख सुरक्षित रखने की मांग की गई है।
जिम्मेदारी तय करने की मांग,
अभ्यावेदन में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यदि जांच में किसी अधिकारी, कर्मचारी अथवा संबंधित विभाग की लापरवाही या कर्तव्य में चूक सामने आती है तो उसके विरुद्ध नियमानुसार विभागीय एवं वैधानिक कार्रवाई की जानी चाहिए।
इसके अलावा वर्ष 2022 से अब तक जांच लंबित रहने के वास्तविक कारणों की भी जांच कर यह निर्धारित करने की मांग की गई है कि जांच में देरी के लिए कोई अधिकारी या कर्मचारी जिम्मेदार है या नहीं।
मामले की निष्पक्षता और पारदर्शिता के लिए आवश्यकता पड़ने पर स्वतंत्र अथवा उच्चस्तरीय जांच दल गठित करने की मांग भी की गई है।
अब नजर कलेक्टर के अगले कदम पर,
इस पूरे मामले में अब प्रशासन की अगली कार्रवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही है। आवेदनकर्ता ने कलेक्टर से 15 दिवस के भीतर जांच की वर्तमान स्थिति और अब तक की गई कार्रवाई की लिखित जानकारी देने की मांग की है।
अभ्यावेदन में यह भी स्पष्ट किया गया है कि यदि निर्धारित अवधि में प्रभावी और विधिसम्मत कार्रवाई नहीं होती अथवा जांच को अनिश्चितकाल तक लंबित रखा जाता है, तो उपलब्ध वैधानिक अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट, बिलासपुर के समक्ष उचित रिट याचिका/जनहित याचिका तथा अन्य सक्षम कानूनी मंचों पर जाने का अधिकार सुरक्षित रखा जाएगा।
ऐसी स्थिति में पूर्व में प्रस्तुत शिकायत, आरटीआई आवेदन एवं जवाब, 12 जनवरी 2022 का वन विभागीय पत्र तथा प्रशासन के समक्ष प्रस्तुत अन्य अभ्यावेदनों को रिकॉर्ड के रूप में प्रस्तुत करने की बात भी आवेदन में कही गई है।
असली सवाल अब यही,
दरहोरा की इस घटना ने चार साल बाद फिर कई सवाल खड़े कर दिए हैं—क्या घटना से पहले संभावित खतरे की सूचना वास्तव में दी गई थी? यदि दी गई थी तो उस पर क्या कार्रवाई हुई? क्या सुरक्षा उपाय किए गए थे? जांच अब तक पूरी क्यों नहीं हुई? और यदि किसी स्तर पर चूक हुई थी तो जवाबदेही किसकी तय हुई?
अब इन सवालों का जवाब संबंधित अभिलेख और आधिकारिक जांच ही दे सकती है। लेकिन इतना तय है कि चार साल पुराने इस मामले में 10 सितंबर को कलेक्टर के समक्ष प्रस्तुत अंतिम कानूनी अभ्यावेदन के बाद प्रशासन के सामने अब जांच की स्थिति स्पष्ट करने और मामले को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाने की मांग पहले से कहीं ज्यादा मजबूती के साथ खड़ी हो गई है।